Friday, December 19, 2008

लागे रज, बधे गज

मिट्टी मिल गई तो मानो स्वर्ग मिल गया...कोई खिलौना, कोई दूसरा खेल, मिट्टी की बराबरी नहीं कर सकता ....उसके आगे टिक ही नहीं सकता। इसलिए मिट्टी में खेलने का कोई भी मौका हम छोड़ते ही नहीं हैं। ऊपर से मम्मा-पापा को कहते हुए भी सुन लिया, 'लागे रज,बधे गज' (कहावत राजस्थानी की है, भावार्थ कुछ ये कि मिट्टी लगने से बच्चा अच्छा बढ़ता है....मिट्टी में खेलना बच्चे के शरीर के लिए अच्छा है.....)। और तो कुछ वाकई में कुछ अच्छा होता हो या नहीं, मगर हाँ इस कहावत कि वजह से हमें मिट्टी में खेलने कि छूट ज़रूर मिल जाती है। सिर्फ़ एक हिदायत के साथ की मैं मिटटी नहीं खाऊँगी (अब मम्मा-पापा को कौन बताये की मिटटी तो मैं पहले बहुत खाती थी, आजकल तो पेंसिल पर ज़ोर है...सुबह मेरे बॉक्स में नई पेंसिल डालते हैं और स्कूल से वापस आने तक वो एकदम छोटी होती है। sharpner से छील-छील कर नहीं.....अब आप ही समझ जाईये ना। घर पर फिर डांट पड़ती मगर अगले दिन फिर एक पेंसिल मिल जाती है...स्कूल के लिए तो देनी ही पड़ेगी ना। )


बात है रविवार की... यानि ३०/११/२००८... सुबह-सुबह ही मम्मा-पापा के साथ हम जहाँ गए वहां बहुत सारे मकान बन रहे थे। अब जब मकान बन रहे थे तो वहां बहुत सारी 'मिट्टी' भी थी। स्वामी अंकल-आंटी और प्रभव वहां पहले से ही थे। अब मैं, अनिमेष और प्रभव ...और पास में ढेर सारी मिट्टी...परिणाम आप ख़ुद ही देख लो....



याद आगई मुंबई की....वहां मासोसा और बल्लू मासी हमें चौपाटी पर मिट्टी में पूरा दबा देते थे....सिर्फ़ चेहरा बाहर और बाकी पूरा शरीर मिट्टी के अन्दर..पापा ने भी हमें मिट्टी में दबा दिया....



अब मिट्टी में दबे हुए होने से क्या..हाथ तो ऊपर ही थे ना...बस फिर क्या था खूब मिट्टी उछाली...बालों में पूरी मिट्टी ही मिट्टी. वो तो मम्मा जब वापस आकर हमें नहलाने लगे तो हमें खूब daant पड़ी क्योंकि बालों से मिट्टी निकल ही नहीं रही थी..खासकर मेरे बालों से...मम्मा ने सख्त हिदायत दी की आईंदा अगर मिट्टी बालों में डाली तो मिट्टी में बिल्कुल नहीं खेलने दिया जायेगा. अब आगे की आगे देखेंगे, आज तो मज़े कर लिए ना...
वैसे अगले रविवार भी पापा हमको मिट्टी में खिलाने ले गए और इस बार किसी की ज़रूरत भी नहीं थी, हम दो ही काफी थे....देखो...

अब तो आज से वैसे भी हमारे खूब मज़े हैं....अरे बाबा, मेरी प्यारी नानिमा जो आ रही हैं जोधपुर से. और पता है साथ में कौन-कौन आ रहा है- जोधपुर से ही कर्नल-आंटी नानिसा और बॉम्बे से लव-भाईसाहब. कब से इंतज़ार कर थी मैं सबका. कल मेरे half-yearly exams ख़तम हो जायेंगे फिर हम सब घूमने जायेंगे...रामेश्वरम..कन्याकुमारी...और भी बहुत सारी ज़गह...वापस आ कर आपको सब बताउंगी. ठीक है?

Sunday, December 14, 2008

स्वीमिंग का पहला अनुभव

हमें स्वीमिंग का बहुत शौक चढ़ा हुआ था (आज तक कभी की जो नही थी )। कब से मम्मा-पापा से जिद कर थे की हमें स्वीमिंग के लिए जाना है। घर में हवा में ही हाथ हिला-हिला कर मम्मा को कहती, 'देखो, मैं स्वीमिंग कर रही हूँ'। पर हर बार (यानी हर सन्डे) कोई न कोई काम या कारण..... और परिणाम यह की हमें स्वीमिंग के लिए नहीं लेजाया गया। फिर पिछले शनिवार हमने मम्मा-पापा को कहा कि कल हम स्वीमिंग के लिए जायेंगे। आख़िर जाकर रविवार (०७/१२/१२) को हमें कहा कि चलो स्वीमिंग के लिए। हम दोनों तो बहुत उत्साहित थे।मम्मा से पूछा कि उनको स्वीमिंग किसने सिखाई? मम्मा ने बताया कि जब वो छोटे थे तो नानोसा ने उनको तैरना सिखाया था। पर फिर मेरे मन में एक विचार आया......कहा , 'हमें तो तैरना आता ही नहीं है, हम तो पानी में डूब जायेंगे' । मम्मा ने कहा,' मैं और तुम्हारे पापा तुम दोनों का ध्यान रखेंगे, तुम्हें सिखायेंगे, डूबने थोड़े ही देंगे ' । मन थोड़ा आश्वस्त हुआ....थोड़ा सोचा तो फिर एक विचार आया...मम्मा से बोली, ' मम्मा, इसमें girls-girls और boys-boys नहीं होता है......( दरअसल, अक्सर हर जगह मैं कहती हूँ girls-girls एक साथ या एक तरफ़ और boys-boys एक साथ.....और मैं मम्मा के साथ हो लेती हूँ और मिशु को पापा के साथ भेजती हूँ ), हाँ ...तो मैंने मम्मा से कहा इसमें girls-girls और boys-boys नहीं होता है.....swimming pool में बड़ा बड़े के साथ और छोटा छोटे के साथ होता है। इसलिए मैं papa के साथ रहूंगी और भैय्या आपके साथ रहेगा '। risk नहीं लेनी बाबा....

पूल में पापा ने तो पहले सीधे dive लगाई। तैयार तो हम भी थे...किनारे पे खड़ी थी कि गोदी लेंगे तो पानी में उतरूंगी....मिशु भी पास ही खडा था ..ट्यूब पहने हुए...पता नहीं उसने क्या सोचा...सीधा पानी में कूद गया (शायद उसे लगा होगा पापा ने किया वैसे ही करना है॥) पर यह क्या...ट्यूब तो पानी के ऊपर और वोह ट्यूब से फिसल कर सीधा पानी के अन्दर.....अच्छा था पापा पास ही थे....उसे जल्दी से पकड़ लिया...वो रोने लगा...उसे थोडी देर गोदी-गोदी ही रखा...मुझे भी गोदी में लेकर पानी में लिया.....पानी ठंडा था...(अब दिसम्बर के महीने में भी कोई स्वीमिंग के लिए जाता है ?) पर हमने फिर खूब मजे किए पानी में.....पापा-मम्मा हमारे पास ही थे.....खूब मजा आया....देखो

ye.....आज तो हम स्वीमिंग करेंगे.....


पूल में उतरने को तैयार....



अब मज़ा आ रहा है...

तैरने कि कोशिश....

पूल से बाहर निकले तो बहुत ठण्ड लग रही थी ....मम्मा ने कहा कि अब गर्मियों में लायेंगे तुम्हें और तब तैरना भी सिखायेंगे.....गर्मियों कि छुट्टियों का इंतज़ार है....

(इतने दिनों पता है क्यों नहीं लिखा? दरअसल laptop में कुछ problem थी पर उसे देखने या ठीक करने का समय ही नहीं मिला...)