Sunday, May 24, 2009

कन्याकुमारी से रामेश्वरम...

कन्याकुमारी से उसी दिन शाम को सूर्यास्त देखने के बाद हम रामेश्वरम के लिए रवाना हो गए। अगले दिन (२३/१२ को ) सुबह-सुबह हम रामेश्वरम (चार धाम में से एक और शिवजी के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक ) पहुँचे। नहा के तैयार हो कर हम मन्दिर गए और शिवलिंग के दर्शन किए। वहाँ नानीमाँ ने अभिषेक करवाया। नानीमाँ ने बताया कि यहीं रामेश्वरम में राम भगवान ने लंका पर चढाई करने से पहले शिवजी की पूजा की थी। हम गंध-मंदन पर्वत भी गए जहाँ से हनुमान जी ने लंका जाने के लिए छलाँग लगाई थी। अब तक तो सिर्फ़ T.V./video पर ही रामायण देखी थी और कहानी सुनी थी। आज वो जगह देख रहे थे जहाँ ये सब हुआ था.........हमने तैरता हुआ पत्थर भी देखा......देखा कहीं वो पुल या पुल का हिस्सा नज़र आ जाए जो भगवान राम ने लंका तक बनाया था, वो तो नज़र नहीं आया पर तैरते हुए कुछ पत्थर ज़रूर दिखे एक मन्दिर में।


तैरता हुआ पत्थर....

वहाँ पर हम जीप कर के धनुष-कोडी गए, रामेश्वरम से थोड़ा दूर था...सड़क के अलावा समुद्र की बालू रेत में ही करीब ४५ मिनट जीप चली थी ......वहाँ सबसे ज्यादा मज़ा आया .....समुद्र तो इतना साफ़ था कि पानी के नीचे ऐसे नज़र आ रहा था मानो कांच में देख रहे हों। हम दोनों ने और लव भाईसाहब ने वहाँ समुद्र में बहुत मस्ती की......दूसरा कोई भी वहाँ नहीं नहा रहा था......पता नहीं क्यों.....वैसे ज्यादा लोग भी नहीं थे....आख़िर कर्नेल आंटी नानीसा के खूब मना करने पर हम पानी से बाहर आए ....नानीसा कह रहे थे कि जब दूसरा कोई भी यहाँ नहीं नहा रहा है तो हो सकता है यह जगह नहाने के लिए इतनी सुरक्षित नहीं हो....पर वहाँ समुद्र तो बहुत शांत था और गहरा भी नहीं था ..... खैर जो भी हो, हम तो तब तक खूब मस्ती कर चुके थे..... देखो ...


नानीमाँ तो शंख चुन रहे हैं....


लव-भाईसाहब के साथ मस्ती....







उसी दिन हम रामेश्वरम से निकल गए......वहीँ से हमने Qualis कर ली थी जो हमें वहां से मदुरै ले गई....रात वहाँ गुजारी....अगले दिन सुबह-सुबह (यानी २४/१२ को) मिनाक्षी मन्दिर में दर्शन कर के उसी गाड़ी में आगे hill-station kodaikanal चले गए......शाम से पहले- पहले, करीब ३.३० बजे kodaikanal पहुँचे गए।

7 comments:

रंजन said...

तुम कन्याकुमारी से निकले और में पहुचाँ.. बहुत मस्ती ्की अब पता चला... ्बहुत प्यारे फोटो...

और जन्मदिन का क्या?

बहुत शुभकामनाऐं.. belated happy birthday..

्प्यार..

vibhu-animesh said...

रंजन अंकल, आपने बताया नहीं आपको कन्याकुमारी में कितने समुद्र दिखे? और रही जन्मदिन की बात, तो अभी पूरी तस्वीरें आने के बाद, तस्वीरों के साथ ही उस दिन के धमाल के किस्से सुनायेंगे इसलिए थोडा pending रख दिया....

PN Subramanian said...

रामेश्वरम की बात अच्छी लगी. जनम दिन भले बीत गया हो, आपको हमारी शुभ कामनाएं.

संगीता पुरी said...

वाह !! सुदर चित्र .. बढिया वर्णन।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

भाई, आपने चित्रों के ज़रिये अच्छी यात्रा करवा दी, धन्यवाद.

माँ शेरोवाली दुर्गा का बेटा_रविन्द मानकर said...

ततीर्थं स्पृस्य राजेंद्र सर्वपापै:प्रमुच्यते
||
अर्थात कावेरी में स्नान करके मनुष्य
समुन्द्र तटवर्ती कन्या तीर्थ में स्नान करे |
इस कन्या तीर्थ का स्पर्श कर लेने मात्र ही
मनुष्य सभी पापो से मुक्त हो जाता है |
कन्याकुमारी एक अंतरीप है |कन्याकुमारी के
दक्षिण में हिन्दमहासागर ,पश्चिम में
अरबसागर ,तथा पूर्व में बंगाल की खड़ी से
घिरा हुआ है |
|पापविनाशं "काशी की गंगा के बाद
कन्याकुमारी का समुन्द्र ही सबसे ज्यादा
पवित्र है |"चैत्र पूर्णिमा को इस स्थान पर
एक साथ बंगाल की खड़ी में चंद्रोदय तथा
अरब सागर में सूर्यास्त दिखाई देता है |जो
अद्भुत है |
कन्या कुमारी के इस त्रिकोणीय संगम
क्षेत्र में कई तीर्थ है |बंगाल की खड़ी के
समुन्द्र में सावित्री, गायत्री ,सरस्वती
,तथा कन्याविनायक आदि तीर्थ है |कहाँ
जाता है सुचित्रं में शिव जी पर किया
जलाभिषेक भूमि के भीतर से आकर इसी
समुन्द्र में मिलता है |तट पर ही गणेशजी का
मन्दिर है जो "इन्द्रकांत" विनायक के नाम
से प्रसिद्द है |क्योकि इस विग्रह की
स्थापना देवराज "इन्द्र "ने की थी |
कन्याकुमारी माँ का भव्य रूप अत्यन्त ही
मनोहारी है |कई द्वारो के भीतर माता हाथो में
माला लिए स्थापित है |कहा जाता है माता का
श्रंगार विशेष अवसरों में हीरकरत्नों से
किया जाता है |मन्दिर के ही दक्षिण
अग्रहार के बीच में भद्रकाली के मन्दिर है जो
५१ पीठो में एक है |यहाँ माता "सती"का पृष्ठ
भाग गिरा था |मन्दिर में चारो और अनेक देव
विग्रह है ,उत्तर में पापविनाशनम
पुष्कर्निया है |इसे" मंडूकतीर्थ "भी कहते है
|कन्या कुमारी से १२ किलोमीटर की दुरी पर
ही "नागरकोइल "नागराज का मन्दिर है कहते
है मन्दिर के चारो और सर्प वास करते है |हर
रविवार ,एवं आइल्या (अश्लेशा )नक्षत्र के
दिन दूध लेकर लोगो की काफी भीड़ रहती है |
लोग कहते है यहाँ सर्प दंश से या विष से
कभी किसी की मृत्यु नही होती |नागरकोइल
से ही चार मील दूर "शुचीन्द्रम "जाहाँ परम
शिव स्थिर हो गए है |यह भगवान्
स्थानुमालका मन्दिर है |इस मंदिर का
प्रधान आकर्षण और विशेषता १८ फुट का
ऊँचा हनुमानजी की प्रतिमा है |कन्याकुमारी
की ये मेरी दूसरी बार यात्रा रही है |बचपन में
जब पहली बार कन्याकुमारी आई तो पहली
बार समुन्द्र देख कर मन काँप उठा था |मुझे
आज भी वो दिन याद है ,सब कुछ मेरे लिए
अद्भुत और आश्चर्य कर देने वाला हुआ
करता था |विवेकानन्द जी के बारे में किताबो
में काफी कुछ पढ़ा था
,अध्यात्म ,आत्मज्ञान ,शान्ति ये केवल
शब्द के जाल मात्र हुआ करते थे पर आज मै
इसकी सार्थकता को समझ सकती हूँ |

माँ शेरोवाली दुर्गा का बेटा_रविन्द मानकर said...

ततीर्थं स्पृस्य राजेंद्र सर्वपापै:प्रमुच्यते
||
अर्थात कावेरी में स्नान करके मनुष्य
समुन्द्र तटवर्ती कन्या तीर्थ में स्नान करे |
इस कन्या तीर्थ का स्पर्श कर लेने मात्र ही
मनुष्य सभी पापो से मुक्त हो जाता है |
कन्याकुमारी एक अंतरीप है |कन्याकुमारी के
दक्षिण में हिन्दमहासागर ,पश्चिम में
अरबसागर ,तथा पूर्व में बंगाल की खड़ी से
घिरा हुआ है |
|पापविनाशं "काशी की गंगा के बाद
कन्याकुमारी का समुन्द्र ही सबसे ज्यादा
पवित्र है |"चैत्र पूर्णिमा को इस स्थान पर
एक साथ बंगाल की खड़ी में चंद्रोदय तथा
अरब सागर में सूर्यास्त दिखाई देता है |जो
अद्भुत है |
कन्या कुमारी के इस त्रिकोणीय संगम
क्षेत्र में कई तीर्थ है |बंगाल की खड़ी के
समुन्द्र में सावित्री, गायत्री ,सरस्वती
,तथा कन्याविनायक आदि तीर्थ है |कहाँ
जाता है सुचित्रं में शिव जी पर किया
जलाभिषेक भूमि के भीतर से आकर इसी
समुन्द्र में मिलता है |तट पर ही गणेशजी का
मन्दिर है जो "इन्द्रकांत" विनायक के नाम
से प्रसिद्द है |क्योकि इस विग्रह की
स्थापना देवराज "इन्द्र "ने की थी |
कन्याकुमारी माँ का भव्य रूप अत्यन्त ही
मनोहारी है |कई द्वारो के भीतर माता हाथो में
माला लिए स्थापित है |कहा जाता है माता का
श्रंगार विशेष अवसरों में हीरकरत्नों से
किया जाता है |मन्दिर के ही दक्षिण
अग्रहार के बीच में भद्रकाली के मन्दिर है जो
५१ पीठो में एक है |यहाँ माता "सती"का पृष्ठ
भाग गिरा था |मन्दिर में चारो और अनेक देव
विग्रह है ,उत्तर में पापविनाशनम
पुष्कर्निया है |इसे" मंडूकतीर्थ "भी कहते है
|कन्या कुमारी से १२ किलोमीटर की दुरी पर
ही "नागरकोइल "नागराज का मन्दिर है कहते
है मन्दिर के चारो और सर्प वास करते है |हर
रविवार ,एवं आइल्या (अश्लेशा )नक्षत्र के
दिन दूध लेकर लोगो की काफी भीड़ रहती है |
लोग कहते है यहाँ सर्प दंश से या विष से
कभी किसी की मृत्यु नही होती |नागरकोइल
से ही चार मील दूर "शुचीन्द्रम "जाहाँ परम
शिव स्थिर हो गए है |यह भगवान्
स्थानुमालका मन्दिर है |इस मंदिर का
प्रधान आकर्षण और विशेषता १८ फुट का
ऊँचा हनुमानजी की प्रतिमा है |कन्याकुमारी
की ये मेरी दूसरी बार यात्रा रही है |बचपन में
जब पहली बार कन्याकुमारी आई तो पहली
बार समुन्द्र देख कर मन काँप उठा था |मुझे
आज भी वो दिन याद है ,सब कुछ मेरे लिए
अद्भुत और आश्चर्य कर देने वाला हुआ
करता था |विवेकानन्द जी के बारे में किताबो
में काफी कुछ पढ़ा था
,अध्यात्म ,आत्मज्ञान ,शान्ति ये केवल
शब्द के जाल मात्र हुआ करते थे पर आज मै
इसकी सार्थकता को समझ सकती हूँ |